एक उलझन…

Posted: November 25, 2010 in Thoughts
इश्वर का अस्तित्व कई बार मन में बड़ा भ्रम उत्पन्न कर देता है. क्या वास्तव में इश्वर है? यदि है तो क्या वही  हमें हमारे कर्मो का फल देता है? यदि नहीं तो क्यूँ हम उसकी असीम सत्ता को मन में रख कर अटूट विश्वास से उसे पूजते हैं. खैर इश्वर के अस्तित्व को चुनौती देने का आज कोई इरादा नहीं है, शायद कभी किसी और दिन मैं इसपर कुछ लिख सकूँ…. आज तो बस बैठे बिठाये कुछ अलग ही सोच मन में आ गयी. और जब मन में आ ही गयी तो सोचा की क्यूँ नो इसे कहीं उकेर भी लूँ.
अनेक बार हम अपने साथ हुए अच्छे बुरे सब प्रकार के जीवन  के अनुभवों को अपने अथवा किसी दुसरे के कर्मो से जोड़ देते हैं. यदा कदा हिन्दू समाज में सुनने को मिलता ही रहता है “पिछले जन्म  के कर्मो का फल है” “कुछ अच्छे/बुरे कर्म किये होंगे”
कौन निर्धारित करता है ये कर्म और इनके फल –  इश्वर या मनुष्य स्वयं ?
 
कहीं अगर किसी  अमीर दुराचारी धनाड्य सेठ  के घर चोरी हो जाये तो ये उसके कर्मो का फल है, पर उस चोर का क्या जिसने ये चोरी की ? क्या ये उस चोर के लिए बुरा कर्म नहीं है? अगर है तो फिर उसे भी इसका फल मिले…. परन्तु  चोर तो उस व्यक्ति के कर्मो का फल देने के लिए एक माध्यम मात्र है फिर उसे दंड क्यूँ ?? यदि इस सोच को और आगे बढाया जाये तो फिर उसी प्रकार से धनाड्य द्वारा किये गए कार्य भी तो किसी और के कर्मो का फल देने के लिए ही किये गए है… तो फिर धनाड्य को भी फल क्यूँ मिले, वो भी तो चोर के ही प्रकार इस “कर्म और फल” के चक्र को पूरा कर रहा है.
अब अगर हम ये मान लें की चोर द्वारा किया गया यह कार्य भी एक बुरा कर्म ही है तो क्या किसी के बुरे कर्मो का फल देने का यही एकमात्र उपाय है ? क्या यह तदन्तर इस बुरे कर्म की परवर्ती को बढ़ावा नहीं देता? अगर इसे सही मन जाये तो इस प्रकार तो निरंतर दुश्प्रवर्तियों का जन्म होगा, और यदि ऐसा होता है तो फिर इश्वर के होने या न होने से अंतर  ही कितना पड़ता है?
चलिए अब इसे एक नए द्रष्टिकोण से देख लिया जाये… मौलिक रूप में देखा जाए तो सबसे पहले कभी किसी ‘अ’ ने कोई ऐसा कार्य किया होगा जिसका उसे फल मिला ( यहाँ मैं ये समझ पाने में असमर्थ हूँ की यदि ये संसार इश्वर जनित है तो फिर इश्वर ने ये दुश्प्रवर्तियाँ उत्पन्न ही क्यूँ की, और यदि की भी हैं तो क्या अब इश्वर का  उनके आधार पर किसी को दंड देना उचित है? और अगर किसी को कर्मो का फल मिलना ही है तो ये किसी दुसरे व्यक्ति के कर्मो के कारण क्यूँ? ), पर अब यदि ‘ब’  ‘अ’ को उसके कर्मो का फल देने का माध्यम था तो इसी चक्र में ‘स’ ‘ब’ के कर्मो के फल का माध्यम होगा और इसी प्रकार ये चक्र चलता रहेगा… परन्तु कब तक ?
शायद मैं इस उलझन को शब्दों में बयां भी नहीं कर सकता, बस एक प्रयास किया है….
बस अब तो यही आता है मन में –
” काश एक बार  खुदा अपनी  फितरत तो बयां करे,
काश समंदर भी कभी किसी दरिया से दुआ करे,
उस रोज़ बेख़ौफ़  हम  ये फिजा कुर्बान दें ए मौला,
जिस रोज़ बस तू अपनी कायनात का पता दे   “
 
 बस अब बैठे-बैठे एक और विचार आ गया “God vs. Probability” पर इस पर चर्चा  फिर कभी…
 
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Comments
  1. anant says:

    ur hindi is as good as ur english…. keep it up boy…..!!

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