कर्फ्यू

Posted: August 19, 2012 in Fiction of My Mind


वह अपने मकान के बरामदे में बिछे हुए लम्बे तख़्त पर बैठी है। तख़्त पर सफ़ेद चादर है, पास में सफ़ेद कागज़ के कुछ बिखरे टुकड़े, एक पुराना सा अख़बार और सामने एक खाली कुर्सी।  छोटे से 4×4 के बिछौने पर इत्मीनान से बैठी कुरान की आएतें पढ़ रही है। सामने के मकान से औरतों के रोने की आवाजें तेज़ हो रही हैं। ये सब सुनकर कुछ बेचैनी के साथ वो भी गली में बाहर आती है, वहां जहाँ बूढ़ा किशन मर रहा है । उसके गले से खरखराहट निकल रही है। औरतों के रोने से मरने वाले की अजीयत में शायद कुछ इजाफा हो जाता है, तभी तो वो सब रो रही हैं।

अपने मकान से निकलकर वह धीमे कदमों से मरते हुए बूढ़े के पास आती है। उसके सर पर हाथ रखती है । उसके गले से निकलती खरखराहट  अचानक थम जाती है। औरतें रोना बंद कर देती हैं, महज एक बूढ़े को मारने के लिए जो नाटक कर रही थी, उस पर एक अजीब सी मायूसियत छा गयी है, मानो बूढ़े के मरने से कुछ थम गया हो।

गली से मिलती गलियों में और गलियों से मिलती सड़कों पर कर्फ्यू है। छोटे से मोहल्ले के दक्षिण में शायद नरक या स्वर्ग के क्लेर्कों ने पहले ही अपने बहीखाते रजिस्टर पूरे कर लिए हैं। यह हवा है, अलगाव की हवा। इस तरह नारों और फायरों के बीच हजारों लाखों लोग जीने के लिए अपना अलगाव मांगते हैं, अपना सुख चैन से जीने का अलगाव। और अलगाव की मांग करने वाले हमेशा रहे हैं, कभी धर्म के नाम पर, कभी जात के नाम पर, और कभी बस प्रांत के नाम पर, पर फर्क क्या पड़ा, दर्जनों मरे, सैकड़ों घायल हुए और दस्तावेजी तारीखों में एक और दिन के आगे कर्फ्यू  लिख दिया गया। कहीं किसी और बूढी सलमा का बेटा अलगाव वादियों के बीच पड गया, और कहीं किसी लक्ष्मी के बेटे मुल्ला मौलवियों के हाथो काट दिए गए।
लेकिन बूढ़े किशन का वाकया अलग है, और अलग इसलिए है क्योंकि वह मरने के मायने में अलग पड़ गया है, दंगों में नहीं मरा ना.. ना ही कर्फ्यू की गोलीबारी में मरा है, बस बूढ़ा था एक दिन मरना था सो आज सही। और फिर इंसान मुहल्लों में कर्फ्यू लगा सकते हैं, जीने मरने पर नहीं। पर बूढ़े किशन की किस्मत, उसे देखने के लिए कोई अपने मकान से निकलकर गली में नहीं जा सकता, और शायद डॉक्टर ने भी इसी लिए आने से मना कर दिया, क्यूंकि बाहर कर्फ्यू है ना। सब  कर्फ्यू से डरते हैं।

पर ये सलमा है, 65 साल की वो बूढी औरत जो अपनी पूरी जुर्रत से गली में गयी। क्यूंकि वो ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है, मानने के नाम पर वो बस कुरान को मानती है, और कुरान में कहीं भी कर्फ्यू का जिक्र नहीं। लिहाजा वह एक बूढ़े पर मौत आसान करके फिर अपने सुने पड़े मकान में वापस आ गयी। अपने जवान बेटे की सलामती की दुआ मांगने, जो शायद कहीं किसी गली में लहूलुहान पड़ा है।

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