चश्मा

Posted: December 5, 2012 in Fiction of My Mind

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दरवाजा
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कितने बरस बीत गए याद नहीं, पर मैं आज भी यहीं हूँ इसी घर के चौखट से लगा हुआ, इस बड़े से घर का मायूस सा पहरेदार, इस बड़े आलीशान घर का दरवाजा। याद है मुझे जब मैं एक पेड़ था, अनंत आकाश और कालजयी धरती के बीच का एक छोटा सा बंधन। शायद इंसान और इंसानियत के बीच का बंधन भी। जब मैं एक बीज था, हजारों सपने थे, हजारो ख्वाहिशें थी, बहुत सारी सच्चाइयों से अनजान, फिर धीरे से सालों तक अपनी जडें जमायी इस धरती में मैंने। एक माँ की तरह ही इस धरती ने मुझे पला और बड़ा किया, मैं हवाओं से खेला और बारिशों में भीगा, चिड़ियों की आवाज़ से मैंने अपने पत्ते फडफडाये और छोटे छोटे बच्चो को कभी अपनी छाया में खेलने दिया  कभी अपने ऊपर चढ़ जाने दिया ।

आज भी देखता हूँ ये सब, पर बस अब मैं चिड़ियों के साथ अपने पत्ते नहीं फडफडाता और हवाओं के साथ खेलता भी नहीं।मैं तब भी इंसान का दोस्त था और आज भी हूँ। मुझे कोई शिकायत नहीं किसी से, बस एक दर्द है, और एक सवाल, क्या कसूर था मेरा ? क्यूँ इंसान ने तब्दील किया मुझे ? क्यूँ वो बारिश अब पहले जैसी नहीं रही ? क्यूँ वो बच्चे मुझसे दूर चले गए ? क्यूँ कोई मदमस्त इंसान रोज़ मुझे  ठोकर मारता है ? सालों से बस यही जवाब ढून्ढ रहा हूँ, अगर आपको पता हो तो…

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     महानता
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अपने वक्त का मै एक महान नेता था, बहुत महान। एक ऐसा नेता जिसके सामने सारे विपक्ष के नेताओ की बोलती बन्द रहती थी. मैने अपने जीते जी जनता की भलाई के लिए कई अच्छे और नेक काम भी किये.
मेरे मरने के बाद मेरी इन्ही अच्छाइयों से कुपित हो कर मेरे इलाके के लोगो ने मेरी एक मूर्ति शहर के चौरहे पर लगा दी.
बडा जुलूस हुआ, बहुत लोग इक्टठा हुए, मेरे बारे मे भाषण भी हुए, मेरी कई सारी आच्छईयो (जो मुझे भी नही पता थी) से जनता को अवगत कराया गया. खूब फूल चढे, जब मेरे दुश्मनो ने भी मेरी तारीफ मे बढ चढ कर हिस्सा लिया तो मुझे बडा अच्छा लगा.

अभी मेरी मुर्ति लगे कुच्छ ही दिन हुए थे, मेरे गले की फूलो वाली माला अभी सूखी भी नही थी कि जाने कहॉ से आकर कौऔ ने मेरे मजबूत बाजुओ को अपना आशियाना और मेरे सर को अपने खेलेने का स्थान बना लिया. इतना दुख तो मै फिर भी बर्दाश्त कर लेता, पर कुछ दिन बाद ही दोपहर मे देखता हू, एक शराबी इधर उधर देखता हुआ मेरे पास आया और छि छि… उसने भी मुझे पवित्र कर दिया.

जैसे जैसे दिन बीतते गये मेरी हालत बद से बद्तर होती गयी, क्या क्या सितम नही हुए मेरे साथ, पशु पक्षियों की बात ही नही, जिस जनता के लिये मैने क्या कुछ नही किया, उसने भी मेरा क्या कुछ नही किया….. भगवान ऐसा दिन किसी को ना दिखाए, आठ आठ आंसू रोता रहा मै अपनी हालत देख कर. हर व्क्त एक ही प्रार्थना करता रहा, मुझे मुक्त कर दो… मुझे मुक्त कर दो…

भगवान के घर देर है अन्धेर नही. एक दिन सरकार की नयी नीतियो से चिढ कर इलाके के कुछ नवजवानो ने सरकार को सबक सिखाने की ठानी और जरिया बना मै…

सुबह होने से पहले ही सब लडके मेरी मुर्ति के सामने इकट्ठा  हुए… और… मूर्ति तोड़ने के लिए एक एक डंडा पड़ता गया, और बस चंद ही घंटो में दूर हो गया मेरी महानता का गुरुर … सच कहें तो महानता का गम। 


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चश्मा
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“अरे मुझे ज़रा ऊपर उठाओ यार, मैं गिर रहा हूँ.. मैं यहाँ तुम्हारी नाक के ऊपर… तुम्हारा चश्मा…”
“ओहो” मैंने नीचे गिरते अपने चश्मे को संभाला। “लेकिन तुम बोल कैसे सकते हो… तुम तो जड़ वास्तु हो… चीज़ें बात नहीं करती… मैं शायद नींद में हूँ।”
“नहीं, तुम नींद में नहीं हो, मैं ही हूँ, तुम्हारा चश्मा”  सच में मेरा चश्मा बोल रहा था, और शायद मैं भी नींद में नहीं था।
“नहीं भाई न ही ये सपना है और न ही तुम नींद में हो, ये मैं ही हूँ, टेप से जुड़ जुड़ कर थक चूका तुम्हारा पुराना चश्मा… कुछ करो, अब तो मेरी हिम्मत जवाब देनी लगी है।”
मैंने कुछ तो बोलना चाहा, पर दबी सी शुर्घुराहत के आलावा गले से कुछ और ना निकल सका।

आज इतवार है,सोचा थोड़ी चैन की नींद ले लूं, एक ही दिन तो मिलता है कागज़ कलम घिसने के आलावा, और इस भागमभाग के बीच इतवार की नींद ही हम लोगो की जन्नत है। वैसे मैं सुधीर, एक छोटी सी कंपनी में क्लर्क हूँ, और एक छोटी सी बिटिया भी है। और गरीब के बच्चे बचपन में ही समझदार हो जाते हैं, वो भी है। कितने वक़्त से सोच रहा हूँ एक नया चश्मा बनवा लूँ, पर अभी तक ये संभव न हो पाया है, बड़े बाबु इस बार डी. ए. की किश्त में कुछ इजाफा कर दें तो जरुर एक नया चस्मा बनवा लूँगा, पर तीन सालों से यही तो सोच रहा हूँ, हर दिन कुछ ना  कुछ खर्चा निकल ही आता है… अब देखो अगले हफ्ते गुडिया के स्कूल वाले पिकनिक ले जा रहे हैं, 300 रूपये मांगे हैं, पर जो भी हो एक अच्छे पिता की तरह मैं भी जानता हूँ वो जाना चाहती है, तो मैं उसे जरुर भेजूंगा। मेरे अभावो को मेरी बेटी क्यूँ भुगते, जब तक संभव है, तब तक तो नहीं, कतई नहीं।

अचानक बिटिया के रोने की आवाज़ से आँख खुली तो देखा मेरा चश्मा जमीन पर पड़ा है, दो टुकड़े में… “पापा मैं वो… मैं स्टूल पर चढ़ कर अपनी किताबें उठा रही थी।” छह साल की बेटी ने गलती से मेरा चश्मा गिरा दिया था स्टूल से और रो रही ही, मैंने कहा था न गरीब के बच्चे बचपन में ही समझदार हो जाते हैं, उसे भी इल्म है, और क्यूँ न हो, पुराने जर्जर टेप से लिपटे चश्मे में कुछ छुपाने को है ही कहाँ…
“ओह कोई बात नहीं बेटा, आप जाओ पढाई करो” किसी भी पिता की तरह मैं अपनी बेटी को रोते हुए नहीं देख सकता, पर मेरा चश्मा ??
मैंने बस एक मायूसियत से उसे घूरते हुए बुदबुदाया  – “माफ़ करना दोस्त, एक टेप और चलेगा ना ?”

और मैं ही नहीं मेरी मजबूरी पर मेरा चश्मा भी मुस्कुरा दिया…

 
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