अकेली

Posted: December 9, 2012 in Fiction of My Mind
कविता को नए फ्लैट में आये हुए 4 दिन हो गए थे, लगभग सारा सामान भी आ गया था, पर घर अभी तक अस्त व्यस्त था। नया शहर, नए लोग, नयी नौकरी वो भी तरक्की के साथ, एक अलग ही एहसास था, खुद पर ग्रवित होने का। यूँ तो 32 साल में ये पहली बार नहीं जब उसे अपने पर गर्व हुआ हो। वो थी इस ऐसी, और हमेशा से ऐसी, बेटे की चाह में हुई 4 बेटियों में सबसे छोटी। बचपन से माँ को मिलते तानों को सुनती आई थी वो, और तभी से ठान लिया था उसने की कुछ कर दिखाना है , आज वो इस बड़े से अखबार की प्रमुख संपादक है, गरीब महिलाओं के लिए 2 एन. जी. ओ. चलती है, और 2 किताबें भी लिख चुकी है। खिड़की के पास बैठी मुस्कुराती वो पता नहीं कब तक पुरानी बातों को याद करती रही। फिर एकाएक किसी गाड़ी की रिवर्स गियर की टिक टुक टिक टुक से यकायक उसका ध्यान टूटा, एक सबसे ज़रूरी काम तो अभी बाकी है…

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“जी नमस्ते, मेरा नाम कविता है, और में आपके बिलकुल ऊपर वाले फ्लैट में रहती हूँ., नीचे केयर टेकर से आपका नंबर लिया..” 
”जी नमस्ते, कहिए?” 
”मुझें घर में काम करने के लिए एक बाई की जरूरत है तो क्या अपनी बाई को ऊपर भेज देंगी?”
”जरूर भेज दूँगी, वैसे कितने लोग है आप के घर में?” 
”बस मैं अकेली ही हूँ।”
”ओह्ह… अच्छा ठीक है, थोड़ी देर में बाई आ जाएगी तो मैं उसे ऊपर भेज दूंगी।”

‘’जी धन्यवाद”… कहकर उसने  इंटेर्कोम रख दिया। थोड़ी देर बाद, दरवाजे की घंटी बजी तो वाकई बाहर एक बाई को खड़ा पाया, मन में एक खुशी के लहर लहरा गयी…सोचा, चलो एक समस्या का समाधान तो आसानी से हो गया है। बाई से सारी बात तय हो गयी थी वक्त और पैसों को लेकर… और फिर अगले दिन से उसके आने का इंतज़ार भी शुरू हो गया था …लगा कि बाई के हाथ में एक सुदर्शन चक्र है और वो कल से उसके अव्यवस्थित घर की धुरी घुमा देगी। वो अगले रोज़ बाई का इंतज़ार करती रही पर वो नहीं आई। एक दिन और निकल गया पर बाई अभी भी नहीं आई।

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थक हार कर उसके अगले दिन वह परेशान सी लिफ्ट से उतर कर किसी नई बाई की तलाश में मुड़ी ही थी कि सामने से वही बाई दिखाई, बाई उसे देख कर कन्नी काटने की कोशिश में थी… मगर कविता ने उसे पकड़ कर पूछ ही लिया –”सब कुछ तय हो तो गया था फिर तुम आई क्यों नहीं?”

वो सकुचा कर बोली…..”मेमसाहब मैं तो आना चाहती थी पर आपके नीचे वाली आंटी जी ने मना कर दिया आपके यहाँ आने से”
”पर क्यों मना किया और तुमने उनकी बात भी मान ली, क्या तुम्हें और पैसा नहीं चाहिए?’
वो बोली… “पैसा किसे बुरा लगे हैं मेमसाहब, पर आप तो यहाँ हमेशा रहने वाली हो नहीं, उनका काम तो पक्का है न, और वो बोल रही थी कि आप अकेली औरत हो…उन्हे शक है कि कुछ…..कि कुछ…..”

इसके आगे बाई कुछ बोली नहीं और चली गई । और कविता चुपचाप खड़ी उसकी पीठ पर अपने अकेले होने के एहसास को ढूँढने लगी।

समझ ही नहीं पाई कि चुनौतियों को पार करके यहाँ तक पहुँचने के लिए खुद को शाबाशी दे , या नीचे वाली उस आंटी जी की “अकेले” शब्द की मानसिकता पर दुख मनाये।

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