कोई एक नखलिस्तान

Posted: February 23, 2013 in So called Poetry

जीवन की राहें, और उम्मीद का दीपक 
चलते रहते हैं सदा साथ-साथ, 
कभी तार-तार होने लगती हैं 
सब उम्मीदें, आशाएं तब भी 
नहीं छोडती उनका साथ,
ये निराशा भरे कदम ठिठकते तो हैं 
लेकिन रुकते नहीं, घिसटते हुए ही सही 
पर अनवरत चलते रहते हैं अपनी 
मंजिल की ओर, जीवन के 
न जाने कितने ताल- तलैया 
कितने खेत-खलिहान, नदी-झील 
पार करते हुए आज कदम
पहुँच गए हैं तपते जलते रेगिस्तान में,
लड़ते हुए, करते हुए संघर्ष कर जायेंगे पार,
या तो फिर पा जायेंगे कोई नया अपना 
एक नखलिस्तान, और बस इसके लिए 
उम्मीद की एक सिहरन ही काफी है।

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